पादप जगत का वर्गीकरण

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The Classification Of Plants – पादप जगत का वर्गीकरण

  • Classification Of Plants पादप जगत का वर्गीकरण को 2 उप-जगत-थैलोफाइटा तथा एम्ब्रियोफाइटा में विभाजित किया गया है।
  • थैलोफाइटा ( Thalophyta ) के अन्तर्गत- शैवाल ( Algae ), कवक ( Fungi ), जीवाणु ( Bacteria ) का अध्ययन करते है।
The Classification Of Plants ( पादप जगत का वर्गीकरण ), Algae – शैवाल, Fungi – कवक, Bacteria – जीवाणु, Bryophyta, Pteridophyta, Gymnosperm, Angio sperm

Algae – शैवाल

  • ये स्वपोषी ( Autrophic )होते हैं, अर्थात्अ पना भोजन स्वयं बनाते है।
  • शैवाल ताजे जल (नदी, तालाब, झरने आदि) तथा खरे जल (समुद्री जल), पहाड़ों, पेड़ों, जीवों आदि पर उगते हैं।
  • जब ये जलीय पौधों तथा जीवों पर उगते हैं तो ये ‘अधिपादपी‘ (Epiphytes) शैवाल कहलाते हैं।
  • जैसे ;- साइकस पौधे की कोर लायड जड़ में “एनाबिना‘ (शैवाल), एन्थेसिरास के थैलस में ‘नास्टाक‘ (शैवाल) पादप अधिपादप के तथा ‘समुद्री एनीमोन’ जीव अधिपादप शैवाल के उदाहरण हैं।
  • इसी तरह जब शैवाल कवक के साथ संघ बनाता है तो “लाइकेन‘ ( Lichen ) कहलाता है।
  • कल्प शैवाल से ‘आयोडीन लवण’ प्राप्त होते हैं।
  • भारत में “स्पाइरोगाइरा‘ (Spirogyra) नामक शैवाल का प्रयोग खाद के रूप में होता है।
  • अल्वा‘ (Ulva) शैवाल को समुद्री सलाद के नाम से जाना जाता है।
  • क्लोरेला‘ नामक शैवाल में 70% प्रोटीन तथा शेष वसा एवं कार्बोहाइड्रेट होते हैं।
  • अन्तरिक्ष यात्री इसे भोजन एवं ऑक्सीजन के लिए इसका उपयोग करते हैं।
  • क्लोरेला से एण्टीबायोटिक्स भी तैयार किये जाते हैं। शैवाल में विटामिन ए, बी, सी तथा ई पायी जाती है।
  • ‘अगर-अगर’ (शैवाल) का उपयोग मरहम तथा दवाबनाने में किया जाता है।
  • डाएटम‘ (Diatom) शैवाल का उपयोग डायनामाइट बनाने में किया जाता है।
  • स्पाइरोगाइरा‘ को तालाबों का रेशम कहते हैं।
  • शैवाल के अध्ययन को फाइकोलॉजी (Phycology) कहते हैं।

Fungi – कवक

  • – ये परपोषी (Heterotrophic) होते हैं।
  • ये अन्य जीवों या वनस्पतियों पर परजीवी (Parasite) के रूप में पलते हैं।
  • जब कवक सड़े-गले एवं मृत कार्बनिक पदार्थों से भोजन प्राप्त करते हैं तो वे ‘मृत जीवी‘ (Saprophyte) कहलाते हैं।
  • ये एक कोशिकीय अथवा शाखावत् तन्तुओं के ‘थैलस‘ होते हैं। कवकों की कोशिका भित्तियाँ एक जटिल नाइत्रजनीय पदार्थ की बनी होती हैं जिसे कवक सेलुलोज कहते हैं।
  • कवक जब शैवाल के साथ जीवन निर्वहन करता है तो यह “लाइकेन‘ कहलाता है।
  • लाइकेन में कवक जल तथा खनिज लवणों को अवशोषण कर शैवाल को देता है तथा शैवाल खाद्य पदार्थों का संश्लेषण कर कवक को देता है।
  • अर्थात् लाइकेन में कवक पौधे की जड़ का काम करता है, जबकि शैवाल पत्तियों का काम करता है।
  • कवक उच्च कुल के पौधों की जड़ों के साथ माइकोरा इजा’ बनाते हैं।
  • अर्थात् कवक उच्च कुल के पौधे की जडत्र से भोजन लेते हैं तथा उसे जल एवं खनिज लवण उपलब्ध कराते हैं।
  • कुछ कवक, जैसे- अगैरिकस, गुच्छी (मार्सेला), मशरूम, आदि भाजन के रूप में प्रयोग किये जाते हैं।
  • मशरूम को ‘साँप की छतरी‘ कहते हैं।
  • खमीर या यीस्ट (दूध से बनता है) के किण्वन (Fermentation– वायु की अनुपस्थिति में श्वसन क्रिया) से इमीन, निकोटिनिक अम्ल तथा राइबोफ्लोबीन विटामिन प्राप्त होते हैं।
  • मशरूम तथा मर्सेला में ‘प्रोटीन, विटामिन व खनिज लवण’ होते हैं जिसके कारण इसका सब्जी के रूप में उपयोग किया जाता है।
  • अनेक मदिराएं ‘यीस्ट‘ से बनायी जाती हैं। यीस्ट-कोशिकाएं शर्करा (Sugar) का किण्वन करके एथिल अल्कोहल का निर्माण करती हैं।
  • यह क्रिया ‘यीस्ट‘ की एनजाइम- ‘जाइमेज‘ द्वारा होती है। कवकों से कुछ एण्टीबायोटिक्स, जैसे-पेन्सिलीन, स्ट्रेप्टोमाइसीन, क्लोरोमाइसिटीन, अरगोटीन तैयार की जाती है।
  • अरगोरीन या अरगोट एण्टीबायोटिक्स बच्चा पैदा होने में देरी की स्थिति में माताओं को दिया जाता है।
  • भारत में पिम्परी और ऋषिकेश में एण्टीबायोटिक्ट निर्मित किये जाते हैं। पौधों के कृत्रिम वृद्धि हार्मोन-“जिबरैलीन‘ कवक द्वारा निर्मित किये जाते हैं।
  • कभी-कभी कवक हमारे भोजन पर आक्रमण कर विषैला बना देते हैं।
  • रोटी या डबल रोटी पर लाल या काले रंग के धब्बे, कवक के ही कारण होते हैं।
  • कवक के अध्ययन को ‘माइकालॉजी‘ (Mycology) कहते हैं।

Bacteria – जीवाणु

  • – इसकी खोज सर्वप्रथम 1683 में, हालैण्ड के वैज्ञानिक एण्टीनीवान ल्यूवेनहाक’ ने स्व-निर्मित सूक्ष्मदर्शी से की।
  • जीवाणु को सर्वप्रथम ‘वैक्टीरिया‘ नाम ‘एहरेनवर्ग‘ ने 1829 में कदया।
  • वैक्टीरिया के अध्ययन को ‘बैक्टीरिओलॉजी (Bacteriology) कहते हैं।
  • जीवाणु एक कोशीय होते हैं तथा सभी जगह जल, थल, वायु में पाये जाते हैं।
  • इनकी कोशाभित्ति लिपिड, प्रोटीन, हेक्सामीन तथा पाली सैकराइड्स की बनी होती हैं।
  • जीवाणु 2 प्रकार के होते हैं- ग्राम पॉजिटिव तथा ग्राम निगेटिव ग्रामनिगेटिव जीवाणु ही रोग उत्पन्न करते हैं।
  • जीवाणु कैप्सुलेटेड अवस्था में ही जन्तुओं में रोग फैलाते हैं।

एम्ब्रियोफाइटा– इसे 4 उप-भागों में विभक्त किया जाता है- (i) ब्रायोफाइटा, (ii) टेरिडेफाइटा, (iii) जिम्नोस्पर्म, (iv) एन्जियोस्पर्म

(i) ब्रायोफाइटा (Bryophyta)

  • इन्हें पादप जगत का उभयचर कहा जाता है।
  • ये आदिम (सबसे प्राचीनतम) स्थलीय पौधे हैं।
  • ये नमी एवं छाया वाले स्थानों पर पाये जाते हैं।
  • रिक्सिया, फ्यूनेरिया, (माँस- Moss), मरकेन्सिया आदि इसके उदाहरण हैं।
  • इन पौधों का उपयोग मृदा अपरदन (Soil Erosion) रोकने में किया जाता है।

(ii) टेरिडोफाइटा (Pteridophyta)

  • – ये पुष्प रहित तथा बीज रहित पौधे होते हैं। ये उभयचर होते हैं।
  • फर्न, सालवीनिया, मार्सीलिया, एजोला आदि उदाहरण हैं।
  • इसवर्ग के इक्वीसीटम पौधे में सिलिका का जमाव होता है।

(iii) जिम्नोस्पर्म (Gymnosperm)

  • – ये नग्नबीजी होते हैं।
  • अर्थात् इनके बीजाण्ड तथा उनसे विकसित बीज या फल किसी खोल में बन्द नहीं होते।
  • ये सदाबहारी होते हैं।
  • इनकी जाइलम ऊतक में वाहिनियों तथा फ्लोयम ऊतक में सह-कोशा का अभाव होता हैं साइकस, पाइनस, इफेड्रा (झाड़ीनुमा) इत्यादि इसके उदाहरण हैं।
  • साइकस‘ की कोरलायड जड़ों में एनाबिना तथा नास्टाक शैवाल होते हैं। जिम्नोस्पर्म पौधे ‘शंकुधारी’ (Coniferous) होते हैं। तारपीन का
  • तेल पाइन वृक्ष से प्राप्त होता है।
  • इसी से चिलगोला प्रापत होता है।
  • इफेड्रा पौधे से दमा एवं श्वसन सम्बन्धी रोगों में दी जाने वाली औषधि ‘इफेड्रीन प्राप्त होती है।
  • साइकस‘ (Cycas) के तने में पर्यापत मात्रा में ‘मंड‘ (Starch) भरा रहता है, जिससे ‘सागो (Sago– साबूदाना) तैयार किया जाता है।
  • इसलिए साइकस के पौधे को ‘साइगोपाम‘ (Sago Palm) कहते हैं।
  • पाइनस (Pinus) के पौधे अत्यन्तविशाल होते हैं।
  • इनमें परागण हवा द्वारा होता है।
  • इनके पराग-कणों की संख्या बहुत अधिक होती है।
  • ये कण पीले रंग के होते हैं।
  • परागण के दौरान ये परागकण पाइनास के जंगलों के ऊपर वायु मण्डल में पीले बादल की तरह छा जाते हैं।
  • इन बादलों को ‘सल्फर वर्षा‘ (Sulpher Shpert) कहते हैं।
  • इन बादलों के कारण महीनों प्रकाश की किरणें धरातल तक नहीं पहुँच पाती। विश्व में सर्वाधिक जंगल जिम्नोस्पर्म के हैं। सर्वाधिक लकड़ी भी इसी से प्राप्त होती है।

(iv) एन्जियोस्पर्म (Angio sperm)

  • – इस वर्ग के पौधों में पुष्प, बीज एवं फल पाये जाते हैं।
  • बीजों के ऊपर खोल या बीजपत्र लगे होते हैं।
  • ये एक बीजपत्री तथा द्वि-बीजपत्री होते हैं।
  • धान, गेहूँ, ज्वार, बाजरा एक बीज पत्री तथा चना, मटर, अरहर, मसूर आदि द्वि-बीज पत्री (द्विदालीय) के उदाहरण हैं।
  • अर्थात् खाद्य फसलें (Cereles Crops) एक दालीय तथा दाल की फसलें (Pulse Crops) द्वि-बीज पत्री या द्वि-दालीय होती है।
  • आम, महुआ, जामुन नीम, पीपल, बरगद, गूलर, शीशम, कैथा, बेर, बेल आदि एंजियो स्पर्म के उदाहरण हैं।
  • वुल्फिया सबसे छोटा पुष्पी पौधा है।
  • सिनकोना जिससे मलेरिया की दवा कुनैन प्राप्त होती है, भी इसी वर्ग का उदाहरण है।
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