संधि विच्छेद इन हिंदी | Sandhi viched hindi | Sandhi viched

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संधि विच्छेद इन हिंदी | Sandhi viched hindi | Sandhi viched

संधि विच्छेद इन हिंदी | Sandhi viched hindi | Sandhi viched
संधि विच्छेद इन हिंदी | Sandhi viched hindi | Sandhi viched

Sandhi viched hindi | संधि विच्छेद इन हिंदी – दो वर्णों के मेल से होने वाले विकार को संधि कहते हैं। इस मिलावट को समझकर वर्णों को अलग करते हुए पदों को अलग-अलग कर देना संधि-विच्छेद ( Sandhi viched ) है।

हिंदी भाषा में संधि द्वारा संयुक्त शब्द लिखने का सामान्य चलन नहीं है। पर संस्कृत में इसके बिना काम नहीं चलता है। संस्कृत के तत्सम शब्द ग्रहण कर लेने के कारण संस्कृत व्याकरण के संधि के नियमों को हिंदी व्याकरण में भी ग्रहण कर लिया गया है।

शब्द रचना में संधियाँ उसी प्रकार सहायक है जैसे उपसर्ग, प्रत्यय, समास आदि। सका मुख्य कारण है कि संस्कृत व्याकरण की एक पुरानी परंपरा है। जिसके लिए व्याकरण को पढ़ना जरूरी है। शब्द रचना के समय संधियां काम आती है। आप इस ब्लॉग में संधि विच्छेद इन हिंदी के बारे में विस्तार से जानेंगे।

संधि तीन प्रकार की होती है। जिसका वर्णन नीचे दिया है।

  1. स्वर संधि
  2. व्यंजन संधि
  3. विसर्ग संधि

स्वर संधि – Swar Sandhi viched hindi

दो स्वरों के मेल से होने वाले विकार (परिवर्तन) को स्वर-संधि कहते हैं। जैसे – विद्या + आलय = विद्यालय।

स्वर-संधि पाँच प्रकार की होती हैं –

  1. दीर्घ संधि
  2. गुण संधि
  3. वृद्धि संधि
  4. यण संधि
  5. अयादि संधि

1. दीर्घ संधि – संधि विच्छेद इन हिंदी

सूत्र- अक: सवर्णे दीर्घः अर्थात् अक् प्रत्याहार के बाद उसका सवर्ण आये तो दोनो मिलकर दीर्घ बन जाते हैं। ह्रस्व या दीर्घ अ, इ, उ के बाद यदि ह्रस्व या दीर्घ अ, इ, उ आ जाएँ तो दोनों मिलकर दीर्घ आ, ई और ऊ हो जाते हैं। जैसे –

(क) अ/आ + अ/आ = आअ + अ = आ –> धर्म + अर्थ = धर्मार्थ / अ + आ = आ –> हिम + आलय = हिमालय / अ + आ =आ–> पुस्तक + आलय = पुस्तकालयआ + अ = आ –> विद्या + अर्थी = विद्यार्थी / आ + आ = आ –> विद्या + आलय = विद्यालय

(ख) इ और ई की संधिइ + इ = ई –> रवि + इंद्र = रवींद्र ; मुनि + इंद्र = मुनींद्रइ + ई = ई –> गिरि + ईश = गिरीश ; मुनि + ईश = मुनीशई + इ = ई- मही + इंद्र = महींद्र ; नारी + इंदु = नारींदुई + ई = ई- नदी + ईश = नदीश ; मही + ईश = महीश .

(ग) उ और ऊ की संधिउ + उ = ऊ- भानु + उदय = भानूदय ; विधु + उदय = विधूदयउ + ऊ = ऊ- लघु + ऊर्मि = लघूर्मि ; सिधु + ऊर्मि = सिंधूर्मिऊ + उ = ऊ- वधू + उत्सव = वधूत्सव ; वधू + उल्लेख = वधूल्लेखऊ + ऊ = ऊ- भू + ऊर्ध्व = भूर्ध्व ; वधू + ऊर्जा = वधूर्जा

2. गुण संधि – संधि विच्छेद इन हिंदी

इसमें अ, आ के आगे इ, ई हो तो ए ; उ, ऊ हो तो ओ तथा ऋ हो तो अर् हो जाता है। इसे गुण-संधि कहते हैं। जैसे –

(क) अ + इ = ए ; नर + इंद्र = नरेंद्रअ + ई = ए ; नर + ईश= नरेशआ + इ = ए ; महा + इंद्र = महेंद्रआ + ई = ए महा + ईश = महेश

(ख) अ + उ = ओ ; ज्ञान + उपदेश = ज्ञानोपदेश ;आ + उ = ओ महा + उत्सव = महोत्सवअ + ऊ = ओ जल + ऊर्मि = जलोर्मि ;आ + ऊ = ओ महा + ऊर्मि = महोर्मि।

(ग) अ + ऋ = अर् देव + ऋषि = देवर्षि

(घ) आ + ऋ = अर् महा + ऋषि = महर्षि

3. वृद्धि संधि – संधि विच्छेद इन हिंदी

अ, आ का ए, ऐ से मेल होने पर ऐ तथा अ, आ का ओ, औ से मेल होने पर औ हो जाता है। इसे वृद्धि संधि कहते हैं। जैसे –

(क) अ + ए = ऐ ; एक + एक = एकैक ;अ + ऐ = ऐ मत + ऐक्य = मतैक्यआ + ए = ऐ ; सदा + एव = सदैवआ + ऐ = ऐ ; महा + ऐश्वर्य = महैश्वर्य

(ख) अ + ओ = औ वन + औषधि = वनौषधि ; आ + ओ = औ महा + औषधि = महौषधि ;अ + औ = औ परम + औषध = परमौषध ; आ + औ = औ महा + औषध = महौषध

4. यण संधि – संधि विच्छेद इन हिंदी

(क) इ, ई के आगे कोई विजातीय (असमान) स्वर होने पर इ ई को ‘य्’ हो जाता है।

(ख) उ, ऊ के आगे किसी विजातीय स्वर के आने पर उ ऊ को ‘व्’ हो जाता है।

(ग) ‘ऋ’ के आगे किसी विजातीय स्वर के आने पर ऋ को ‘र्’ हो जाता है। इन्हें यण-संधि कहते हैं।इ + अ = य् + अ ; यदि + अपि = यद्यपिई + आ = य् + आ ; इति + आदि = इत्यादि।ई + अ = य् + अ ; नदी + अर्पण = नद्यर्पणई + आ = य् + आ ; देवी + आगमन = देव्यागमन

(घ)उ + अ = व् + अ ; अनु + अय = अन्वयउ + आ = व् + आ ; सु + आगत = स्वागतउ + ए = व् + ए ; अनु + एषण = अन्वेषणऋ + अ = र् + आ ; पितृ + आज्ञा = पित्राज्ञा

5. अयादि संधि – संधि विच्छेद इन हिंदी

ए, ऐ और ओ औ से परे किसी भी स्वर के होने पर क्रमशः अय्, आय्, अव् और आव् हो जाता है। इसे अयादि संधि कहते हैं।

(क) ए + अ = अय् + अ ; ने + अन = नयन

(ख) ऐ + अ = आय् + अ ; गै + अक = गायक

(ग) ओ + अ = अव् + अ ; पो + अन = पवन

(घ) औ + अ = आव् + अ ; पौ + अक = पावक

औ + इ = आव् + इ ; नौ + इक = नाविक

व्यंजन संधि – संधि विच्छेद इन हिंदी

व्यंजन का व्यंजन से अथवा किसी स्वर से मेल होने पर जो परिवर्तन होता है उसे व्यंजन संधि कहते हैं। जैसे-शरत् + चंद्र = शरच्चंद्र। उज्ज्वल

(क) किसी वर्ग के पहले वर्ण क्, च्, ट्, त्, प् का मेल किसी वर्ग के तीसरे अथवा चौथे वर्ण या य्, र्, ल्, व्, ह या किसी स्वर से हो जाए तो क् को ग् च् को ज्, ट् को ड् और प् को ब् हो जाता है। जैसे -क् + ग = ग्ग दिक् + गज = दिग्गज। क् + ई = गी वाक + ईश = वागीशच् + अ = ज् अच् + अंत = अजंत ट् + आ = डा षट् + आनन = षडाननप + ज + ब्ज अप् + ज = अब्ज

(ख) यदि किसी वर्ग के पहले वर्ण (क्, च्, ट्, त्, प्) का मेल न् या म् वर्ण से हो तो उसके स्थान पर उसी वर्ग का पाँचवाँ वर्ण हो जाता है। जैसे -क् + म = ं वाक + मय = वाङ्मय च् + न = ं अच् + नाश = अंनाशट् + म = ण् षट् + मास = षण्मास त् + न = न् उत् + नयन = उन्नयनप् + म् = म् अप् + मय = अम्मय

(ग) त् का मेल ग, घ, द, ध, ब, भ, य, र, व या किसी स्वर से हो जाए तो द् हो जाता है। जैसे -त् + भ = द्भ सत् + भावना = सद्भावना त् + ई = दी जगत् + ईश = जगदीशत् + भ = द्भ भगवत् + भक्ति = भगवद्भक्ति त् + र = द्र तत् + रूप = तद्रूपत् + ध = द्ध सत् + धर्म = सद्धर्म

(घ) त् से परे च् या छ् होने पर च, ज् या झ् होने पर ज्, ट् या ठ् होने पर ट्, ड् या ढ् होने पर ड् और ल होने पर ल् हो जाता है। जैसे -त् + च = च्च उत् + चारण = उच्चारण त् + ज = ज्ज सत् + जन = सज्जनत् + झ = ज्झ उत् + झटिका = उज्झटिका त् + ट = ट्ट तत् + टीका = तट्टीकात् + ड = ड्ड उत् + डयन = उड्डयन त् + ल = ल्ल उत् + लास = उल्लास

(ङ) त् का मेल यदि श् से हो तो त् को च् और श् का छ् बन जाता है। जैसे -त् + श् = च्छ उत् + श्वास = उच्छ्वास त् + श = च्छ उत् + शिष्ट = उच्छिष्टत् + श = च्छ सत् + शास्त्र = सच्छास्त्र

(च) त् का मेल यदि ह् से हो तो त् का द् और ह् का ध् हो जाता है। जैसे -त् + ह = द्ध उत् + हार = उद्धार त् + ह = द्ध उत् + हरण = उद्धरणत् + ह = द्ध तत् + हित = तद्धित

(छ) स्वर के बाद यदि छ् वर्ण आ जाए तो छ् से पहले च् वर्ण बढ़ा दिया जाता है। जैसे -अ + छ = अच्छ स्व + छंद = स्वच्छंद आ + छ = आच्छ आ + छादन = आच्छादनइ + छ = इच्छ संधि + छेद = संधिच्छेद उ + छ = उच्छ अनु + छेद = अनुच्छेद

(ज) यदि म् के बाद क् से म् तक कोई व्यंजन हो तो म् अनुस्वार में बदल जाता है। जैसे -म् + च् = ं किम् + चित = किंचित म् + क = ं किम् + कर = किंकरम् + क = ं सम् + कल्प = संकल्प म् + च = ं सम् + चय = संचयम् + त = ं सम् + तोष = संतोष म् + ब = ं सम् + बंध = संबंधम् + प = ं सम् + पूर्ण = संपूर्ण

(झ) म् के बाद म का द्वित्व हो जाता है। जैसे -म् + म = म्म सम् + मति = सम्मति म् + म = म्म सम् + मान = सम्मान

(ञ) म् के बाद य्, र्, ल्, व्, श्, ष्, स्, ह् में से कोई व्यंजन होने पर म् का अनुस्वार हो जाता है। जैसे -म् + य = ं सम् + योग = संयोग म् + र = ं सम् + रक्षण = संरक्षणम् + व = ं सम् + विधान = संविधान म् + व = ं सम् + वाद = संवादम् + श = ं सम् + शय = संशय म् + ल = ं सम् + लग्न = संलग्नम् + स = ं सम् + सार = संसार

(ट) ऋ, र्, ष् से परे न् का ण् हो जाता है। परन्तु चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग, श और स का व्यवधान हो जाने पर न् का ण् नहीं होता। जैसे -र् + न = ण परि + नाम = परिणाम र् + म = ण प्र + मान = प्रमाण

(ठ) स् से पहले अ, आ से भिन्न कोई स्वर आ जाए तो स् को ष हो जाता है। जैसे -भ् + स् = ष अभि + सेक = अभिषेक नि + सिद्ध = निषिद्ध वि + सम + विषम

विसर्ग संधि – संधि विच्छेद इन हिंदी

विसर्ग (:) के बाद स्वर या व्यंजन आने पर विसर्ग में जो विकार होता है उसे विसर्ग-संधि कहते हैं। जैसे- मनः + अनुकूल = मनोनुकूल

(क) विसर्ग के पहले यदि ‘अ’ और बाद में भी ‘अ’ अथवा वर्गों के तीसरे, चौथे पाँचवें वर्ण, अथवा य, र, ल, व हो तो विसर्ग का ओ हो जाता है। जैसे -मनः + अनुकूल = मनोनुकूल ; अधः + गति = अधोगति ; मनः + बल = मनोबल

(ख) विसर्ग से पहले अ, आ को छोड़कर कोई स्वर हो और बाद में कोई स्वर हो, वर्ग के तीसरे, चौथे, पाँचवें वर्ण अथवा य्, र, ल, व, ह में से कोई हो तो विसर्ग का र या र् हो जाता है। जैसे -निः + आहार = निराहार ; निः + आशा = निराशा निः + धन = निर्धन

(ग) विसर्ग से पहले कोई स्वर हो और बाद में च, छ या श हो तो विसर्ग का श हो जाता है। जैसे -निः + चल = निश्चल ; निः + छल = निश्छल ; दुः + शासन = दुश्शासन

(घ) विसर्ग के बाद यदि त या स हो तो विसर्ग स् बन जाता है। जैसे -नमः + ते = नमस्ते ; निः + संतान = निस्संतान ; दुः + साहस = दुस्साहस

(ङ) विसर्ग से पहले इ, उ और बाद में क, ख, ट, ठ, प, फ में से कोई वर्ण हो तो विसर्ग का ष हो जाता है। जैसे -निः + कलंक = निष्कलंक ; चतुः + पाद = चतुष्पाद ; निः + फल = निष्फल

(च) विसर्ग से पहले अ, आ हो और बाद में कोई भिन्न स्वर हो तो विसर्ग का लोप हो जाता है। जैसे -निः + रोग = नीरोग ; निः + रस = नीरस

(छ) विसर्ग के बाद क, ख अथवा प, फ होने पर विसर्ग में कोई परिवर्तन नहीं होता। जैसे -अंतः + करण = अंतःकरण

यहाँ वर्णक्रम से संधि विच्छेद ( Sandhi viched hindi )संग्रहित किए गए हैं। साथ ही संधि का प्रकार भी निर्देशित है।

अ, आ

  • अंतःकरण = अंतः + करण (विसर्ग-संधि)
  • अजंत = अच् + अंत (व्यंजन संधि)
  • अंनाश = अच् + नाश (व्यंजन संधि)
  • अधोगति = अधः + गति (विसर्ग-संधि)
  • अनुच्छेद = अनु + छेद (व्यंजन संधि)
  • अन्वय = अनु + अय (यण स्वर संधि)
  • अन्वेषण = अनु + एषण (यण स्वर संधि)
  • अब्ज = अप् + ज (व्यंजन संधि)
  • अभिषेक = अभि + सेक (व्यंजन संधि)
  • अम्मय = अप् + मय (व्यंजन संधि)
  • आच्छादन = आ + छादन (व्यंजन संधि)

अत्रैव = अत्र + एव (वृद्दि संधि)

  • इत्यादि = इति + आदि (यण स्वर संधि)
  • अहीर = अहि + ईर (दीर्घ सन्धि)

उ, ऊ

  • उच्चारण = उत् + चारण (व्यंजन संधि)
  • उच्छिष्ट = उत् + शिष्ट (व्यंजन संधि)
  • उज्झटिका = उत् + झटिका (व्यंजन संधि)
  • उड्डयन = उत् + डयन (व्यंजन संधि)
  • उद्धरण = उत् + हरण (व्यंजन संधि)
  • उद्धार = उत् + हार (व्यंजन संधि)
  • उन्नयन = उत् + नयन (व्यंजन संधि)
  • उल्लास = उत् + लास (व्यंजन संधि
  • उल्लेख = उत् + लेख (व्यंजन संधि)

ए, ऐ

  • एकैक = एक + एक (वृद्धि स्वर संधि)

ओ, औ, अं, अः

क, ख

  • किंकर = किम् + कर (व्यंजन संधि)
  • किंचित = किम् + चित (व्यंजन संधि)

ग, घ, ङ

  • गायक = गै + अक (अयादि स्वर संधि)
  • गिरीश = गिरि + ईश (दीर्घ स्वर सन्धि)

च, छ

  • चतुष्पाद = चतुः + पाद (विसर्ग-संधि)

ज, झ, ञ

  • जगदीश = जगत् + ईश (व्यंजन संधि)
  • जलोर्मि = जल + ऊर्मि (गुण स्वर सन्धि)

ट, ठ

ड, ढ, ण

त, थ

  • तट्टीका = तत् + टीका (व्यंजन संधि)
  • तद्धित = तत् + हित (व्यंजन संधि)
  • तद्रूप = तत् + रूप (व्यंजन संधि)

द, ध, न

तेनादिष्ट= तेन+अदिष्ट (दीर्घ संधि)

  • दिग्गज = दिक् + गज (व्यंजन संधि)
  • दुश्शासन = दुः + शासन (विसर्ग-संधि)
  • दुस्साहस = दुः + साहस (विसर्ग-संधि)
  • देवर्षि = देव + ऋषि (गुण स्वर सन्धि)
  • देव्यागमन = देवी + आगमन (यण स्वर संधि)
  • धर्मार्थ = धर्म + अर्थ (दीर्घ स्वर सन्धि)
  • नदीश = नदी + ईश (दीर्घ स्वर सन्धि)
  • नद्यर्पण = नदी + अर्पण (यण स्वर संधि)
  • नमस्ते = नमः + ते (विसर्ग-संधि)
  • नयन = ने + अन (अयादि स्वर संधि)
  • नरेंद्र = नर + इंद्र (गुण स्वर सन्धि)
  • नरेश = नर + ईश (गुण स्वर सन्धि)
  • नारींदु = नारी + इंदु (दीर्घ स्वर सन्धि)
  • नाविक = नौ + इक (अयादि स्वर संधि)
  • निराशा = निः + आशा (विसर्ग-संधि)
  • निराहार = निः + आहार (विसर्ग-संधि)
  • निरोग = निः + रोग (विसर्ग-संधि)
  • निर्धन = निः + धन (विसर्ग-संधि)
  • निश्चल = निः + चल (विसर्ग-संधि)
  • निश्छल = निः + छल (विसर्ग-संधि)
  • निषिद्ध = नि + सिद्ध (व्यंजन संधि)
  • निष्कलंक = निः + कलंक (विसर्ग-संधि)
  • निष्फल = निः + फल (विसर्ग-संधि)
  • निस्संतान = निः + संतान (विसर्ग-संधि)
  • नीरस = निः + रस (विसर्ग-संधि)

प, फ

  • परमौषध = परम + औषध (वृद्धि स्वर संधि)
  • परिणाम = परि + नाम (व्यंजन संधि)
  • पवन = पो + अन (अयादि स्वर संधि)
  • पावक = पौ + अक (अयादि स्वर संधि)
  • पित्राज्ञा = पितृ + आज्ञा (यण स्वर संधि)
  • प्रमाण = प्र + मान (व्यंजन संधि)

ब, भ, म

  • भगवद्भक्ति = भगवत् + भक्ति (व्यंजन संधि)
  • भानूदय = भानु + उदय (दीर्घ स्वर सन्धि)
  • भूर्ध्व = भू + ऊर्ध्व (दीर्घ स्वर सन्धि)
  • मतैक्य = मत + ऐक्य (वृद्धि स्वर संधि)
  • मनोनुकूल = मनः + अनुकूल (विसर्ग-संधि)
  • मनोबल = मनः + बल (विसर्ग-संधि)
  • महर्षि = महा + ऋषि (गुण स्वर सन्धि)
  • महींद्र = मही + इंद्र (दीर्घ स्वर सन्धि)
  • महीश = मही + ईश (दीर्घ स्वर सन्धि)
  • महेंद्र = महा + इंद्र (गुण स्वर सन्धि)
  • महेश = महा + ईश (गुण स्वर सन्धि)
  • महैश्वर्य = महा + ऐश्वर्य (वृद्धि स्वर संधि)
  • महोत्सव = महा + उत्सव (गुण स्वर सन्धि)
  • महोर्मि = महा + ऊर्मि (गुण स्वर सन्धि)
  • महौषध = महा + औषध (वृद्धि स्वर संधि)
  • महौषधि = महा + औषध (वृद्धि स्वर संधि)
  • मुनींद्र = मुनि + इंद्र (दीर्घ स्वर सन्धि)
  • मुनीश = मुनि + ईश (दीर्घ स्वर सन्धि)

य, र, ल, व

  • यद्यपि = यदि + अपि (यण स्वर संधि)
  • रवींद्र = रवि + इंद्र (दीर्घ स्वर सन्धि)
  • लघूर्मि = लघु + ऊर्मि (दीर्घ स्वर सन्धि)
  • वधूत्सव = वधू + उत्सव (दीर्घ स्वर सन्धि)
  • वधूर्जा = वधू + ऊर्जा (दीर्घ स्वर सन्धि)
  • वधूल्लेख = वधू + उल्लेख (दीर्घ स्वर सन्धि)
  • वनौषधि = वन + ओषधि (वृद्धि स्वर संधि)
  • वागीश = वाक + ईश (व्यंजन संधि)
  • वाड़्मय = वाक + मय (व्यंजन संधि)
  • विद्यार्थी = विद्या + अर्थी (दीर्घ स्वर सन्धि)
  • विद्यालय = विद्या + आलय (दीर्घ स्वर सन्धि)
  • विधूदय = विधु + उदय (दीर्घ स्वर सन्धि)
  • विषम = वि + सम (व्यंजन संधि)

श, ष, स, ह

  • षडानन = षट् + आनन (व्यंजन संधि)
  • षण्मास = षट् + मास (व्यंजन संधि)
  • संकल्प = सम् + कल्प (व्यंजन संधि)
  • संचय = सम् + चय (व्यंजन संधि)
  • संतोष = सम् + तोष (व्यंजन संधि)
  • संधिच्छेद = संधि + छेद (व्यंजन संधि)
  • संपूर्ण = सम् + पूर्ण (व्यंजन संधि)
  • संबंध = सम् + बंध (व्यंजन संधि)
  • संयोग = सम् + योग (व्यंजन संधि)
  • संरक्षण = सम् + रक्षण (व्यंजन संधि)
  • संलग्न = सम् + लग्न (व्यंजन संधि)
  • संवाद = सम् + वाद (व्यंजन संधि)
  • संविधान = सम् + विधान (व्यंजन संधि)
  • संशय = सम् + शय (व्यंजन संधि)
  • संसार = सम् + सार (व्यंजन संधि)
  • सच्छास्त्र = सत् + शास्त्र (व्यंजन संधि)
  • सज्जन = सत् + जन (व्यंजन संधि)
  • सदैव = सदा + एव (वृद्धि स्वर संधि)
  • सद्धर्म = सत् + धर्म (व्यंजन संधि)
  • सद्भावना = सत् + भावना (व्यंजन संधि)
  • सम्मति = सम् + मति (व्यंजन संधि)
  • सम्मान = सम् + मान (व्यंजन संधि)
  • सिंधूर्मि = सिधु + ऊर्मि (दीर्घ स्वर सन्धि)
  • स्वच्छंद = स्व + छंद (व्यंजन संधि)
  • स्वागत = सु + आगत (यण स्वर संधि)
  • हिमालय = हिम + आलय (दीर्घ स्वर सन्धि)

क्ष, त्र, ज्ञ

  • ज्ञानोपदेश = ज्ञान + उपदेश (गुण स्वर सन्धि)

संधि किसे कहते हैं?

दो वर्णों के मेल से होने वाले विकार को संधि कहते हैं।

संधि विच्छेद इन हिंदी ( Sandhi viched Hindi ) की परिभाषा

दो वर्णों के मेल से होने वाले विकार को संधि कहते हैं। इस मिलावट को समझकर वर्णों को अलग करते हुए पदों को अलग-अलग कर देना संधि-विच्छेद है।

संधि विच्छेद ( Sandhi viched hindi) किसे कहते हैं?

दो वर्णों के मेल से होने वाले विकार को संधि कहते हैं। इस मिलावट को समझकर वर्णों को अलग करते हुए पदों को अलग-अलग कर देना संधि-विच्छेद है।

संधि कितने प्रकार की होती है ?

संधि तीन प्रकार की होती है। जिसका वर्णन नीचे दिया है।

  1. स्वर संधि
  2. व्यंजन संधि
  3. विसर्ग संधि 

इन सभी प्रकार को आगे वर्णित किया गया है।

संधि विच्छेद ( Sandhi viched hindi ) क्या है ?

दो वर्णों के मेल से होने वाले विकार को संधि कहते हैं। इस मिलावट को समझकर वर्णों को अलग करते हुए पदों को अलग-अलग कर देना संधि-विच्छेद है।

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